टॉपिक 4: छत्तीसगढ़ में मराठा शासन (The Maratha Rule in Chhattisgarh – 1741 से 1853 ईस्वी) परीक्षा की दृष्टि से एक जटिल लेकिन अत्यधिक अंक-दिलाने वाला (Scoring) चैप्टर है। इस काल में छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में कई बड़े और अनोखे प्रयोग किए गए, जैसे सूबा व्यवस्था और परगना पद्धति।
मराठों ने कलचुरियों को हटाकर छत्तीसगढ़ पर नियंत्रण किया। इस पूरे शासनकाल को समझने के लिए इसे 4 मुख्य चरणों में बाँटा जाता है:
[छत्तीसगढ़ में मराठा शासन — प्रमुख चरण]
1. अप्रत्यक्ष मराठा शासन
1741 – 1758 ईस्वी
भास्कर पंत का आक्रमण
2. प्रत्यक्ष मराठा शासन
1758 – 1787 ईस्वी
राजा बिम्बाजी भोंसले
3. सूबा शासन प्रणाली
1787 – 1818 ईस्वी
व्यंकोजी भोंसले / सूबेदार
4. ब्रिटिश अधीन मराठा शासन
1818 – 1830 ईस्वी
ब्रिटिश कप्तानों का नियंत्रण
1. अप्रत्यक्ष मराठा शासन (1741 – 1758 ईस्वी)
- पृष्ठभूमि: नागपुर के भोंसले राजा रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने उड़ीसा (बंगाल) जाते समय 1741 ईस्वी में रतनपुर के कलचुरी राजा रघुनाथ सिंह पर आक्रमण किया।
- स्वरूप: इस दौरान मराठों ने सीधे शासन नहीं किया, बल्कि कलचुरी राजाओं को अपने अधीन रखकर उनसे कर (Tax) वसूलते रहे।
2. प्रत्यक्ष मराठा शासन: राजा बिम्बाजी भोंसले (1758 – 1787 ईस्वी)
यह छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्ष मराठा शासन का स्वर्णिम दौर था। रघुजी प्रथम के छोटे पुत्र बिम्बाजी भोंसले ने छत्तीसगढ़ की सत्ता संभाली।
- राजधानी: इन्होंने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाया।
- प्रमुख कार्य एवं उपलब्धियाँ:
- प्रशासनिक एकीकरण: इन्होंने रतनपुर और रायपुर की दोनों कलचुरी शाखाओं को मिलाकर एक एकीकृत (Unified) छत्तीसगढ़ राज्य की नींव रखी।
- न्याय व्यवस्था: रतनपुर में एक ‘नियमित न्यायालय’ की स्थापना की।
- धार्मिक कार्य: रतनपुर के रामटेक पहाड़ी पर प्रसिद्ध राम मंदिर का निर्माण करवाया। इन्होंने दशहरे के अवसर पर ‘रावण दहन’ की प्रथा और ‘सद्भावना’ (मुस्लिम संतों को भूमि दान) को बढ़ावा दिया।
- मृत्यु: 1787 ईस्वी में इनकी मृत्यु के बाद इनकी पत्नी आनंदीबाई ने सत्ता की बागडोर संभाली। इनका सूबेदार महिपतराव के साथ सत्ता संघर्ष (Ego clash) इतिहास में प्रसिद्ध है।
3. सूबा शासन प्रणाली (Suba Governance System – 1787 से 1818 ईस्वी)
बिम्बाजी की मृत्यु के बाद नागपुर के राजा व्यंकोजी भोंसले यहाँ के शासक बने। लेकिन वे खुद नागपुर में ही रहे और छत्तीसगढ़ का शासन चलाने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे, जिन्हें ‘सूबेदार’ कहा गया। इसी व्यवस्था को सूबा प्रणाली कहते हैं।
- विशेषता: यह एक तरह की ठेकेदारी प्रथा थी। जो व्यक्ति नागपुर के राजा को सबसे ज्यादा टैक्स देने का वादा करता था, उसे छत्तीसगढ़ का सूबेदार बना दिया जाता था। इस कारण इस काल में छत्तीसगढ़ का अत्यधिक आर्थिक शोषण हुआ।
- प्रमुख सूबेदार (क्रोनोलॉजी एग्जाम में पूछी जाती है):
- महिपतराव दिनकर (प्रथम सूबेदार): इनके समय आनंदीबाई के पास वास्तविक शक्ति थी। प्रसिद्ध अंग्रेज यात्री फॉरेस्टर (1790 ईस्वी) इन्हीं के समय छत्तीसगढ़ आया था।
- विट्ठल दिनकर: यह सबसे महत्वपूर्ण सूबेदार था। इसने छत्तीसगढ़ में ‘परगना पद्धति’ (Pargana System) की शुरुआत की। इसने छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों को समाप्त कर उन्हें 27 परगनों में बदल दिया।
- भवानी कालू: सबसे कम समय तक रहने वाला सूबेदार।
- केशव गोविंद: सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाला सूबेदार। इनके समय मिस्टर ब्लंट (1795 ईस्वी) ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी।
- भीकाजी गोपाल: इनके समय छत्तीसगढ़ में पिंडारियों (Looters) का भारी आतंक रहा।
- यादवराव दिवाकर (अंतिम सूबेदार): इनके समय सूबा प्रथा समाप्त हो गई।
4. ब्रिटिश अधीन मराठा शासन (1818 – 1830 ईस्वी)
तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में नागपुर के अप्पा साहब मराठा हार गए। रघुजी तृतीय अल्पवयस्क (नाबालिग) थे, इसलिए छत्तीसगढ़ का प्रशासन सीधे ब्रिटिश रेजिडेंट के हाथों में आ गया। इस काल में अंग्रेजों ने छत्तीसगढ़ को संभालने के लिए ब्रिटिश अधीक्षकों (Superintendents) की नियुक्ति की:
- कैप्टन एडमंड (प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक): इनके समय डोंगरगढ़ के जमींदार का विद्रोह हुआ, जिसे इन्होंने दबाया।
- मेजर पी. वेंस एग्न्यू (सबसे महत्वपूर्ण अधीक्षक):
- राजधानी परिवर्तन (1818 ईस्वी): इन्होंने छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक राजधानी रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित की। तब से रायपुर छत्तीसगढ़ का मुख्य केंद्र बना।
- प्रशासनिक सुधार: इन्होंने विट्ठल दिनकर के 27 परगनों को पुनर्गठित करके केवल 8 बड़े परगनों में समेट दिया। छत्तीसगढ़ में पहली बार ‘डाक व्यवस्था’ की शुरुआत की।
- कैप्टन क्राफर्ड: इनके समय छत्तीसगढ़ का प्रशासन वापस परिपक्व हो चुके मराठा राजा रघुजी तृतीय को सौंप दिया गया (जिससे ब्रिटिश अधीक्षकों का काल समाप्त हुआ और पुनः भोंसले शासन शुरू हुआ, जिसे जिल्लेदारी प्रथा कहते हैं)।
अंत (1853 ईस्वी)
1853 ईस्वी में नागपुर के राजा रघुजी तृतीय की बिना संतान के मृत्यु हो गई। लॉर्ड डलहौजी ने अपनी ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) के तहत छत्तीसगढ़ (नागपुर साम्राज्य) को पूर्णतः ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। 1854 ईस्वी में छत्तीसगढ़ का प्रथम डिप्टी कमिश्नर चार्रल्स सी. इलियट को बनाया गया।
Direct Exam Quick Revision Table (Direct Match)
| नाम / प्रणाली | मुख्य घटना / विशेषता | संबंधित वर्ष |
|---|---|---|
| भास्कर पंत | छत्तीसगढ़ पर प्रथम मराठा आक्रमण | 1741 ईस्वी |
| बिम्बाजी भोंसले | प्रथम प्रत्यक्ष मराठा शासक, राम मंदिर निर्माण | 1758 ईस्वी |
| विट्ठल दिनकर | परगना पद्धति के जनक (27 परगने बनाए) | सूबा काल |
| मेजर एग्न्यू | राजधानी रतनपुर से रायपुर बदली (8 परगने किए) | 1818 ईस्वी |
| लॉर्ड डलहौजी | हड़प नीति के तहत छत्तीसगढ़ को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया | 1853 ईस्वी |