टॉपिक 6: छत्तीसगढ़ की मिट्टियाँ एवं कृषि

यह टॉपिक कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ राज्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ की लगभग 80% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और यहाँ की विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ ही फसलों के स्वरूप को तय करती हैं।

आइए, टॉपिक 6: छत्तीसगढ़ की मिट्टियाँ एवं कृषि को पूरी गहराई और प्रामाणिक आँकड़ों के साथ समझते हैं।

भाग 1: छत्तीसगढ़ की मिट्टियाँ (Soils of Chhattisgarh)

छत्तीसगढ़ की मिट्टियों का निर्माण मुख्य रूप से यहाँ के शैल समूहों (जैसे कड़प्पा, आर्कियन, दक्कन ट्रैप) के क्षरण से हुआ है। छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से 5 प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं।

[छत्तीसगढ़ की मिट्टियाँ — प्रतिशत विस्तार]

लाल-पीली
~50-55%

लाल-बलुई
~25-30%

लाल-दोमट
~10-15%

काली
~5-10%

लैटेराइट
~4-5%

1. लाल-पीली मिट्टी (Red-Yellow Soil)

  • स्थानीय नाम: मटासी मिट्टी
  • प्रतिशत विस्तार: लगभग 50% से 55% (यह छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली सबसे बड़ी मिट्टी संरचना है)।
  • विस्तार क्षेत्र: संपूर्ण मध्य छत्तीसगढ़ (महानदी बेसिन/छत्तीसगढ़ का मैदान) और सरगुजा संभाग के कुछ हिस्से।
  • रंग का कारण: फेरिक ऑक्साइड (Fe2O3) के कारण इसका रंग पीला और जलयोजित लौह ऑक्साइड के कारण लाल होता है।
  • प्रकृति: अम्लीय से उदासीन (pH मान: 5.5 से 8.5 के बीच)।
  • मुख्य फसल: धान (Rice) की खेती के लिए यह सबसे उत्तम मिट्टी मानी जाती है। इसमें जल धारण करने की क्षमता मध्यम होती है।

2. लाल-बलुई मिट्टी (Red-Sandy Soil)

  • स्थानीय नाम: टिकरा मिट्टी
  • प्रतिशत विस्तार: लगभग 25% से 30% (राज्य की दूसरी सबसे बड़ी मिट्टी)।
  • विस्तार क्षेत्र: मुख्य रूप से दण्डकारण्य का पठार (बस्तर संभाग) और राजनांदगांव, बालोद के कुछ पहाड़ी हिस्से।
  • प्रकृति: अम्लीय। इसमें कंकड़-पत्थरों और बालू (रेत) की मात्रा अधिक होती है, जिससे इसकी जल धारण क्षमता बहुत कम होती है।
  • मुख्य फसल: मोटे अनाज (Millets) जैसे- कोदो, कुटकी, रागी और ज्वार-बाजरा।

3. लाल-दोमट मिट्टी (Red-Loamy Soil)

  • प्रतिशत विस्तार: लगभग 10% से 15%
  • विस्तार क्षेत्र: सुदूर दक्षिण छत्तीसगढ़ (मुख्य रूप से दंतेवाड़ा और सुकमा जिले)।
  • विशेषता: लौह अयस्क की अधिकता के कारण इसका रंग गहरा लाल होता है। नमी की कमी होने पर यह मिट्टी बहुत जल्दी पत्थर जैसी कठोर हो जाती है।
  • मुख्य फसल: मोटे अनाज और धान (जहाँ सिंचाई उपलब्ध हो)।

4. काली मिट्टी (Black Soil / Regur)

  • स्थानीय नाम: कणहार या भर्री मिट्टी
  • प्रतिशत विस्तार: लगभग 5% से 10%
  • विस्तार क्षेत्र: मैदानी भागों के निचले हिस्से (जैसे बेमेतरा, मुंगेली, कवर्धा, धमतरी, गरियाबंद) और घाटी क्षेत्र। इसका निर्माण दक्कन ट्रैप के बेसाल्ट लावा से हुआ है।
  • विशेषता: इस मिट्टी में जल धारण क्षमता (Water Retention) सबसे अधिक होती है। सूखने पर इसमें बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाती हैं। चीका (Clay) की मात्रा इसमें सर्वाधिक होती है।
  • मुख्य फसल: चना, गेहूँ, गन्ना, अलसी (तीवरा) और कपास। कवर्धा में इस मिट्टी के कारण गन्ने का भारी उत्पादन होता है।

5. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)

  • स्थानीय नाम: भाटा या मुरमी मिट्टी
  • प्रतिशत विस्तार: लगभग 4% से 5%
  • विस्तार क्षेत्र: मुख्य रूप से जशपुर-सामरी पाट प्रदेश और जगदलपुर के कुछ उच्च भूमि वाले क्षेत्र।
  • विशेषता: यह निक्षालन (Leaching – भारी वर्षा के कारण पोषक तत्वों का बह जाना) प्रक्रिया से बनती है। यह कम उपजाऊ और पथरीली होती है।
  • मुख्य फसल: बागवानी फसलें (जैसे चाय, लीची, tomato, आलू) और भवन निर्माण के लिए ईंट बनाने में यह सर्वाधिक उपयोगी है।

मिट्टियों का ढाल के अनुसार क्रम (Top-to-Bottom Sequence)

बस्तर के पहाड़ी ढालों और उत्तर छत्तीसगढ़ में मिट्टियों को ऊँचाई से निचाई के क्रम में अलग-अलग स्थानीय नामों से पुकारा जाता है, जो एग्जाम में सीधे पूछे जाते हैं:

बस्तर के पठार में (ऊपर से नीचे का क्रम):
मरहान → टिकरा → माल → गाभर

उत्तर छत्तीसगढ़/सरगुजा में (ऊपर से नीचे का क्रम):
टिकरा → छावर → गाद-छावर → बहरा

भाग 2: छत्तीसगढ़ की कृषि (Agriculture of CG)

छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ (Bowl of Rice) कहा जाता है क्योंकि यहाँ की भौगोलिक बनावट के कारण यहाँ धान की पैदावार और इसकी किस्में (लगभग 23,250 से अधिक पारंपरिक किस्में) ऐतिहासिक रूप से समृद्ध रही हैं।

  • कृषि का प्रकार: मुख्य रूप से जीविकोपार्जी कृषि (Subsistence Agriculture)।
  • प्रमुख फसलें:
    1. धान (Rice): राज्य की मुख्य और प्राथमिक खरीफ फसल है। कुल कृषि क्षेत्र के लगभग 65-70% भाग पर केवल धान की खेती होती है।
    2. चना (Chickpea): यह राज्य की मुख्य रबी फसल है। इसका सर्वाधिक उत्पादन बेमेतरा और कवर्धा जिलों में होता है।
    3. मक्का (Maize): सरगुजा (विशेषकर बलरामपुर) और बस्तर (कोण्डागांव) में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। कोण्डागांव को ‘मक्का जिला’ (Maize District) भी कहा जाता है।
    4. गन्ना (Sugarcane): कवर्धा (कबीरधाम) जिले में सर्वाधिक उत्पादित होता है।
    5. कोदो-कुटकी-रागी (Millets): बस्तर और वनांचल क्षेत्रों की मुख्य फसलें हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘मिलेट मिशन’ के तहत रागी और कोदो-कुटकी के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी तय किया है।
  • कृषि जलवायु क्षेत्र (Agro-Climatic Zones): छत्तीसगढ़ को 3 कृषि जलवायु क्षेत्रों में बाँटा गया है:
    • छत्तीसगढ़ का मैदान (Central Plain): सबसे बड़ा भाग, धान और चना बहुल।
    • बस्तर का पठार (Bastar Plateau): मोटे अनाज और कंदमूल फसलें।
    • उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र (Northern Hills): सरगुजा संभाग – मक्का, दलहन और बागवानी फसलें।

डायरेक्ट एग्जाम वन-लाइनर फैक्ट्स (Quick Revision)

छत्तीसगढ़ की सबसे उपजाऊ मिट्टीकाली मिट्टी (कणहार)
छत्तीसगढ़ की सबसे कम उपजाऊ मिट्टीलैटेराइट मिट्टी (भाटा)
धान के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टीलाल-पीली मिट्टी (मटासी)
एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडीजगदलपुर (बस्तर)
छत्तीसगढ़ का एकमात्र जूट उद्योगमोहन जूट मिल (रायगढ़) — वर्तमान में बंद/ऐतिहासिक महत्व
मक्का प्रसंस्करण केंद्रकोण्डागांव

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