टॉपिक 9: छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ एवं उनका भौगोलिक वितरण

छत्तीसगढ़ को “जनजातियों की भूमि” (Land of Tribes) कहा जाता है। भारत के संविधान के तहत छत्तीसगढ़ में 42 अनुसूचित जनजातियाँ (Scheduled Tribes) निवास करती हैं, जो आगे 161 उप-समूहों में विभाजित हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 30.6% हिस्सा जनजातियों का है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से जनजातियों का भौगोलिक वितरण (Geographical Distribution) और उनकी अनूठी विशेषताएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आइए, इसे पूरी गहराई से समझते हैं।

टॉपिक 9: छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ एवं उनका भौगोलिक वितरण

छत्तीसगढ़ की जनजातियों को उनके निवास स्थान के आधार पर मुख्य रूप से 3 भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटा गया है:

[जनजातियों का भौगोलिक वितरण]

1. उत्तरी क्षेत्र (सरगुजा संभाग)
मुख्य जनजातियाँ: पहाड़ी कोरवा, नगेसिया, उरांव, खैरवार, पंडो

2. मध्य क्षेत्र (मैदानी भाग)
मुख्य जनजातियाँ: बिंझवार, कंवर, धनवार, हलबा, बैगा

3. दक्षिणी क्षेत्र (बस्तर संभाग)
मुख्य जनजातियाँ: गोंड, अबूझमाड़िया, मुरिया, माड़िया, भतरा, दोरला, धुर्वा

1. उत्तरी क्षेत्र (सरगुजा एवं जशपुर संभाग)

यह क्षेत्र छोटानागपुर के पठार और पाट प्रदेशों से घिरा है। यहाँ मुख्य रूप से निम्नलिखित जनजातियाँ निवास करती हैं:

  • उरांव (Oraon): यह छत्तीसगढ़ की सबसे साक्षर (Most Educated) जनजाति है।
    • विशेषता: इनका मुख्य नृत्य ‘सरहुल’ है और ये ‘कुरुख’ भाषा बोलते हैं। इनके युवागृह (Youth Dormitory) को ‘धूमकुरिया’ कहा जाता है।
  • पहाड़ी कोरवा (Hill Korwa): यह केंद्र सरकार द्वारा घोषित विशेष रूप से कमजोर जनजाति (PVTG) है।
    • विशेषता: ये पेड़ों पर मचान बनाकर रहते हैं। इनमें ‘दमनच’ नृत्य प्रचलित है, जिसे सबसे भयानक/भयावह नृत्य माना जाता है। इनकी पंचायत को ‘मय्यारी’ कहते हैं।
  • नगेसिया (Nagesia): यह जनजाति मुख्य रूप से रायगढ़, सरगुजा और जशपुर में पाई जाती है। ये स्वयं को ‘किसान’ कहलाना पसंद करते हैं।
  • खैरवार (Khairwar): सरगुजा, बलरामपुर क्षेत्र में निवास। इनका पारंपरिक कार्य खैर वृक्ष से कत्था (Catechu) निकालना है।
  • पंडो (Pando): इन्हें छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है। ये स्वयं को पांडवों का वंशज मानते हैं।

2. मध्य क्षेत्र (रायपुर, बिलासपुर एवं दुर्ग संभाग)

मैदानी और सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों (जैसे मैकल श्रेणी) में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियाँ:

  • बैगा (Baiga): कवर्धा, मुंगेली और बिलासपुर के मैकल पर्वत क्षेत्र में निवास करने वाली विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) है।
    • विशेषता: इन्हें “संसार की सबसे अधिक गोदना प्रिय (Tattoo-loving) जनजाति” माना जाता है। इनके मुख्य नृत्य ‘कर्मा’ (जिसे लोक नृत्यों का राजा कहते हैं), ‘बिलमा’ और ‘सैला’ हैं। ये झाड़-फूंक और पारंपरिक वैद्य (Medicine man) का काम करते हैं।
  • बिंझवार (Binjhwar): रायपुर, बलौदाबाजार और महासमुंद क्षेत्र में निवास।
    • विशेषता: छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह इसी जनजाति के थे। इनका जाति चिन्ह ‘तीर’ (Arrow) होता है।
  • कंवर (Kanwar): सरगुजा, बिलासपुर और रायगढ़ के मैदानी भागों में निवास। ये स्वयं को कौरवों का वंशज मानते हैं। इनका पारंपरिक कार्य सैन्य सेवा / जमींदारी रहा है।
  • हलबा (Halba): रायपुर, दुर्ग और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास। यह आर्थिक और शैक्षणिक रूप से काफी समृद्ध जनजाति है। इनका पारंपरिक कार्य चिउड़ा (पोहा) बनाना और कृषि है। ये कबीरपंथ से बहुत प्रभावित हैं।
  • धनवार (Dhanwar): बिलासपुर और कोरबा क्षेत्र में निवास। इनका पारंपरिक कार्य बाँस के बर्तन और धनुष-बाण बनाना है।

3. दक्षिणी क्षेत्र (बस्तर संभाग / दण्डकारण्य)

बस्तर को “जनजातियों का सांस्कृतिक गढ़” कहा जाता है। यहाँ की जनजातियों की संस्कृति पूरे विश्व में अनूठी है:

  • गोंड (Gond): यह छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी जनजाति है। राज्य की कुल जनजाति जनसंख्या का लगभग 56% केवल गोंड हैं। ये द्रविड़ भाषा परिवार की ‘गोन्डी’ बोली बोलते हैं।
  • अबूझमाड़िया (Abujhmadia): नारायणपुर के अबूझमाड़ की पहाड़ियों में रहने वाली विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) है। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में रहने के कारण इनकी प्राचीन संस्कृति आज भी बची हुई है। ये ‘पेद्डा’ (स्थानांतरित कृषि) करते हैं।
  • मुरिया / मुड़िया (Muria): बस्तर और कोण्डागांव क्षेत्र में निवास।
    • विशेषता: इनकी संस्कृति में युवागृह ‘घोटुल’ का बहुत महत्व है। इनका प्रसिद्ध लोक नृत्य ‘ककसार’ और ‘मांदरी’ है। प्रसिद्ध मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन ने इनके ऊपर “The Muria and their Ghotul” नामक विश्वप्रसिद्ध किताब लिखी थी।
  • माड़िया (Bison-horn Maria): ये मुख्य रूप से दंतेवाड़ा और सुकमा में रहते हैं।
    • विशेषता: ये पुरुष नृत्य के समय सिर पर जंगली भैंसे (Bison) के सींग का मुकुट पहनते हैं, इसलिए इन्हें ‘बायसन-हॉर्न माड़िया’ कहा जाता है। इनके नृत्य को वेरियर एल्विन ने “दुनिया का सबसे सुंदर नृत्य” कहा था।
  • भतरा (Bhatra): बस्तर के उत्तरी भाग में निवास। इनका पारंपरिक कार्य सेवा कार्य (Puriests/Servants) रहा है। बस्तर का प्रसिद्ध लोक नाट्य ‘भतरा नाट’ इन्हीं की देन है।
  • धुर्वा (Dhurwa): बस्तर और सुकमा क्षेत्र में निवास। इनका मुख्य नृत्य ‘परब नृत्य’ है, जो एक सैन्य नृत्य (Military dance) की तरह होता है।
  • दोरला (Dorla): सुकमा और बीजापुर के सुदूर दक्षिण में निवास। ये गोदावरी नदी के प्रभाव के कारण ‘दोरली’ (जो तेलुगु से प्रभावित है) बोली बोलते हैं।

परीक्षा के लिए विशेष तथ्य: विशेष पिछड़ी जनजातियाँ (PVTG)

छत्तीसगढ़ में कुल 7 विशेष पिछड़ी जनजातियाँ हैं, जिनसे परीक्षा में हर बार सवाल आता है:

  • केंद्र सरकार द्वारा घोषित (5):
    1. अबूझमाड़िया (नारायणपुर)
    2. बैगा (कवर्धा/मुंगेली)
    3. पहाड़ी कोरवा (सरगुजा/जशपुर)
    4. कमार (गरियाबंद – इनका पारंपरिक कार्य बाँस शिल्प है)
    5. बिरहोर (रायगढ़/जशपुर – ये रस्सी बनाने का कार्य करते हैं)
  • राज्य सरकार द्वारा घोषित (2):
    1. पंडो (सरगुजा/बलरामपुर)
    2. भुंजिया (गरियाबंद – इनका ‘लाल बंगला’ रसोईघर प्रसिद्ध है)

डायरेक्ट एग्जाम मैचिंग की-फैक्ट्स (Quick Summary)

जनजाति (Tribe)युवागृह (Youth House)मुख्य नृत्य (Key Dance)विशेष कार्य / तथ्य
मुरियाघोटुलककसार, मांदरीबस्तर की सबसे सांस्कृतिक जनजाति
उरांवधूमकुरियासरहुलसबसे साक्षर जनजाति, कुरुख बोली
बैगाकर्मा, बिलमासबसे ज्यादा गोदना प्रिय, मैकल श्रेणी
माड़ियाकर्मा / गौर नृत्यबायसन-हॉर्न (भैंसे के सींग का मुकुट)
बिंझवारशहीद वीर नारायण सिंह की जनजाति
खैरवारखैर वृक्ष से कत्था निकालना

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