टॉपिक 3: छत्तीसगढ़ का कलचुरी राजवंश (The Kalchuri Dynasty)

टॉपिक 3: छत्तीसगढ़ का कलचुरी राजवंश (The Kalchuri Dynasty) छत्तीसगढ़ के इतिहास का सबसे लंबा, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे लोकप्रिय चैप्टर है। छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था, संस्कृति और यहाँ तक कि इसके नाम “छत्तीसगढ़” का सीधा संबंध इसी राजवंश से है.

कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ पर लगभग 800 से अधिक वर्षों तक (10वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक) शासन किया, जो पूरे भारत में किसी एक क्षेत्र पर सबसे लंबे समय तक शासन करने का एक रिकॉर्ड है।

आइए, इसे दो मुख्य शाखाओं (रतनपुर शाखा और रायपुर शाखा) के अनुसार पूरी गहराई से समझते हैं।

छत्तीसगढ़ का कलचुरी राजवंश

छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश की दो शाखाएँ थीं:

[छत्तीसगढ़ के कलचुरी]

1. रतनपुर की मुख्य शाखा
उत्तर एवं मध्य छत्तीसगढ़
संस्थापक: कलिंगराज (1000 ईस्वी)

2. रायपुर की लहुरी शाखा
दक्षिणी-मध्य छत्तीसगढ़
संस्थापक: लक्ष्मीदेव / रामचंद्रदेव

1. रतनपुर के कलचुरी (मुख्य शाखा)

त्रिपुरी (मध्य प्रदेश) के कलचुरी राजा कोक्कल प्रथम के पुत्र शंकरगण द्वितीय ने सर्वप्रथम पाली (कोरबा) के बाण वंशीय शासकों को हराकर छत्तीसगढ़ में पैर पसारे थे। लेकिन वास्तविक स्थायित्व 1000 ईस्वी में आया।

प्रमुख शासक एवं उनके कार्य:

  • कलिंगराज (1000 – 1020 ईस्वी):
    • यह छत्तीसगढ़ में कलचुरी सत्ता का वास्तविक संस्थापक था।
    • इसने अपनी पहली राजधानी ‘तुम्माण’ (वर्तमान कोरबा जिला) को बनाया।
  • रत्नदेव प्रथम (1045 – 1065 ईस्वी):
    • इसने 1050 ईस्वी में ‘रतनपुर’ शहर बसाया और राजधानी को तुम्माण से रतनपुर स्थानांतरित (Shift) किया।
    • इसने रतनपुर में प्रसिद्ध महामाया मंदिर और महिषासुर मर्दिनी मंदिर का निर्माण करवाया। रतनपुर को ‘कुबेरपुर’ या ‘तालाबों की नगरी’ भी कहा जाता था।
  • पृथ्वीदेव प्रथम (1065 – 1090 ईस्वी):
    • इसने ‘सकल कोसलाधिपति’ और ‘प्रचंड कोसलाधिपति’ की उपाधि धारण की।
    • इसने तुम्माण में विशाल ‘पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर’ और रतनपुर में एक बहुत बड़ा किला (गज किला) बनवाया।
  • जाजल्लदेव प्रथम (1090 – 1120 ईस्वी):
    • यह इस वंश का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा था। इसने त्रिपुरी के कलचुरियों की अधीनता को पूरी तरह त्याग कर खुद को स्वतंत्र घोषित किया।
    • इसने अपने नाम पर ‘जाजल्लपुर’ (वर्तमान जांजगीर) शहर बसाया और वहाँ एक सुंदर विष्णु मंदिर (जहाँ वर्तमान में केवल गर्भगृह है, जिसे नक्टा मंदिर भी कहते हैं) बनवाया।
    • इसने सोने और तांबे के सिक्के चलाए, जिन पर ‘श्रीमज्जाजल्लदेव’ और ‘गजशार्दुल’ (हाथी को दबाते हुए सिंह) अंकित था। इसने बस्तर के छिन्दक नागवंशी राजा सोमेश्वर देव को सपरिवार बंदी बना लिया था (बाद में सोमेश्वर की माता के कहने पर छोड़ा)।
  • रत्नदेव द्वितीय (1120 – 1135 ईस्वी):
    • इसके समय उड़ीसा के prataapi गंगवंशी राजा अनंतवर्मा चोडगंग ने छत्तीसगढ़ पर आक्रमण किया, जिसे रत्नदेव द्वितीय ने ‘शिवरीनारायण के युद्ध’ में बुरी तरह हराया।
  • कल्याणसाय (1544 – 1581 ईस्वी):
    • यह कलचुरी राजा मुगल सम्राट अकबर के दरबार में गया था और 8 वर्ष वहाँ रहा।
    • जमाबंदी प्रणाली: कल्याणसाय ने छत्तीसगढ़ में पहली बार राजस्व की ‘जमाबंदी प्रणाली’ लागू की। इसने पूरे राज्य को 36 गढ़ों में विभाजित किया (महानदी के उत्तर में 18 गढ़ और दक्षिण में 18 गढ़)। यही छत्तीसगढ़ के नाम का ऐतिहासिक आधार बना।
  • रघुनाथ सिंह (1741 ईस्वी):
    • यह रतनपुर शाखा का अंतिम कलचुरी राजा था। 1741 ईस्वी में मराठा सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर पर आक्रमण किया। रघुनाथ सिंह उस समय पुत्र शोक में डूबे थे, इसलिए उन्होंने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया और इस तरह स्वतंत्र कलचुरी शासन का अंत हो गया।

2. रायपुर के कलचुरी (लहुरी शाखा)

14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलचुरी वंश का विभाजन हुआ और रायपुर में एक नई शाखा स्थापित हुई, जिसे ‘लहुरी शाखा’ कहा जाता है।

  • संस्थापक: कुछ स्रोतों में लक्ष्मीदेव को माना जाता है, लेकिन वास्तविक रूप से स्वतंत्र कार्य रामचंद्रदेव के समय हुआ।
  • रामचंद्रदेव (14वीं शताब्दी): इसने खलारी (महासमुंद) को अपनी पहली राजधानी बनाया। इसने अपने पुत्र ‘हरिब्रह्मदेव’ या ‘रायसिंह’ के नाम पर ‘रायपुर’ शहर की नींव रखी
  • ब्रह्मदेव राय (1409 ईस्वी): इसने 1409 ईस्वी में अपनी राजधानी खलारी से रायपुर स्थानांतरित की। इसके समय खलारी में इसके मोची सामंत (देवपाल) द्वारा प्रसिद्ध नारायण मंदिर बनवाया गया था।
  • अमरसिंह (1750 ईस्वी): यह रायपुर शाखा का अंतिम राजा था। मराठों ने इसे हटाकर पेंशनर बना दिया और रायपुर को सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया।

कलचुरी कालीन प्रशासनिक व्यवस्था (Governance System)

कलचुरियों की शासन व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित और विकेंद्रीकृत थी, जिससे परीक्षा में सीधे पदनाम (Designations) पूछे जाते हैं:

  • राजा: सर्वोच्च अधिकारी, न्याय और सेना का प्रमुख।
  • महामात्य: राजा का मुख्य सलाहकार (प्रधान मंत्री)।
  • महाप्रतिहार: राजमहल की सुरक्षा और राजा से मिलने वाले अतिथियों का प्रबंधन करने वाला अधिकारी।
  • गढ व्यवस्था (प्रशासनिक इकाइयाँ):
    • गढ़: प्रत्येक गढ़ के अधीन 84 ग्राम होते थे। इसका प्रमुख ‘दीवान’ कहलाता था।
    • बरहो: प्रत्येक गढ़ के भीतर 7 या 12 ग्रामों का समूह ‘बरहो’ कहलाता था (सामान्यता 12 गाँव)। इसका प्रमुख ‘ठाकुर’ होता था।
    • ग्राम: प्रशासन की सबसे छोटी इकाई। इसका प्रमुख ‘गोटिया’ (Gaontia) कहलाता था।

Direct Exam Quick Revision Table (Direct Match Facts)

राजा / पद (King / Post)मुख्य कार्य / पहचानसंबंधित स्थान / शहर
कलिंगराजकलचुरी वंश का वास्तविक संस्थापकतुम्माण (प्रथम राजधानी)
रत्नदेव प्रथमरतनपुर शहर बसाया, महामाया मंदिररतनपुर (द्वितीय राजधानी)
जाजल्लदेव प्रथमजांजगीर शहर बसाया, सबसे प्रतापी राजाजांजगीर
कल्याणसाय36 गढ़ों का निर्धारण, जमाबंदी प्रणालीरतनपुर / दिल्ली (मुगल दरबार)
ब्रह्मदेव रायराजधानी रायपुर स्थानांतरित कीरायपुर
गोटियागाँव का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारीग्राम स्तर

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