छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति, पर्व एवं लोक विधाएँ

हाँ, एक बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक छूट रहा है, जिससे CGPSC और Vyapam में हर साल 3 से 5 प्रश्न निश्चित रूप से आते हैं। वह टॉपिक है: “छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति, पर्व एवं लोक विधाएँ” (Art, Culture, Festivals & Folk Arts of CG)

चूँकि छत्तीसगढ़ एक जनजातीय और लोक-संस्कृति प्रधान राज्य है, इसलिए इसके इतिहास और भूगोल को जानने के बाद यहाँ के गीत, नृत्य, नाट्य और त्योहारों को समझना परीक्षा के दृष्टिकोण से सबसे ज़रूरी हो जाता है।

आइए, इस छूटे हुए अत्यंत महत्वपूर्ण टॉपिक को भी पूरी गहराई से कवर कर लेते हैं ताकि आपकी तैयारी 100% पूरी हो जाए।

छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति एवं लोक विधाएँ

इस टॉपिक को हम 4 मुख्य भागों में बाँटकर पढ़ेंगे:

[छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति]

1. लोक नृत्य
पंथ, राउत नाचा, सुआ

2. लोक गीत
पंडवानी, भरथरी, ददरिया

3. लोक नाट्य
नाचा, गम्मत, रहस

4. प्रमुख पर्व/त्योहार
हरेली, तीजा, पोला, छेरछेरा

1. छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नृत्य (Folk Dances)

  • पन्थी नृत्य (Panthi Dance):
    • संबंध: यह छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय का मुख्य पारंपरिक नृत्य है।
    • विशेषता: यह बाबा गुरु घासीदास के भजनों और जैतखाम के चारों ओर किया जाता है। इसमें अत्यंत तीव्र गति से पिरामिड (Human Pyramid) बनाए जाते हैं। इसके प्रसिद्ध कलाकार देवदास बंजारे हैं।
  • राउत नाचा (Raut Nacha):
    • संबंध: यादव (राउत) जाति द्वारा देवउठनी एकादशी (दीपावली के बाद) के अवसर पर किया जाता है।
    • विशेषता: इसमें पुरुष रंग-बिरंगी वेशभूषा पहनकर हाथ में लाठी लेकर शौर्य प्रदर्शन करते हैं और बीच-बीच में ‘दोहे’ गाते हैं। बिलासपुर का राउत नाचा महोत्सव पूरे राज्य में प्रसिद्ध है।
  • सुआ नृत्य (Sua / Parrot Dance):
    • संबंध: इसे छत्तीसगढ़ की महिलाओं द्वारा दीपावली के अवसर पर किया जाता है।
    • विशेषता: इसे ‘तोता नृत्य’ भी कहते हैं। महिलाएँ टोकरी में मिट्टी का तोता रखकर उसके चारों ओर ताली बजाकर झुकते हुए नृत्य करती हैं। यह एक प्रकार का शृंगार और विरह नृत्य है।
  • कर्म नृत्य (Karma Dance): यह मुख्य रूप से बैगा, गोंड और उरांव जनजातियों द्वारा कर्म देवता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इसे ‘लोक नृत्यों का राजा’ कहा जाता है।
  • गौर नृत्य (Gaur Dance): बस्तर के माड़िया जनजाति द्वारा। पुरुष सिर पर भैंसे के सींग का मुकुट पहनकर यह नृत्य करते हैं (वेरियर एल्विन ने इसे दुनिया का सबसे सुंदर नृत्य कहा था)।

2. प्रमुख लोक गीत (Folk Songs)

  • पंडवानी (Pandwani):
    • विषय: महाभारत की कथा को छत्तीसगढ़ी लोक शैली में गाना। इसमें ‘भीम’ मुख्य नायक होता है।
    • शैलियाँ: इसकी दो शैलियाँ हैं:
      1. वेदमती शैली: बैठकर गाना (प्रमुख कलाकार: झाड़ूराम देवांगन, पुनाराम निषाद)।
      2. कापालिक शैली: खड़े होकर, हाथ में तंबूरा लेकर अभिनय करते हुए गाना (प्रमुख कलाकार: तीजन बाई — जिन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण मिल चुका है, और शांतिबाई चेलक)।
  • भरथरी (Bharthari): राजा भरथरी और रानी पिंगला के वैराग्य की कहानी। इसकी प्रसिद्ध गायिका सूरज बाई खांडे हैं। इसमें इकतारा और सारंगी बजाया जाता है।
  • ददरिया (Dadariya): इसे “छत्तीसगढ़ी लोक गीतों का राजा” कहा जाता है। यह एक सवाल-जवाब की शैली में गाया जाने वाला शृंगारिक/प्रेम गीत है, जिसे अक्सर फसल काटते समय गाया जाता है।
  • बांस गीत (Baans Geet): यह राउत (यादव) जाति द्वारा गाया जाने वाला एक कथा गीत है, जिसमें मुख्य रूप से मोरध्वज की कथा होती है। इसमें एक बहुत बड़े बांस के वाद्ययंत्र का उपयोग होता है।

3. प्रमुख लोक नाट्य (Folk Theatre)

  • नाचा / गम्मत (Nacha):
    • विशेषता: यह छत्तीसगढ़ का सबसे लोकप्रिय पारंपरिक रंगमंच है। इसमें पूरी रात सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य (Comedy/Satire) करते हुए नाटक दिखाया जाता है। इसमें पुरुषों द्वारा महिलाओं का किरदार निभाया जाता है, जिन्हें ‘परी’ कहा जाता है।
    • महान कलाकार: दाऊ दुलार सिंह मंदराजी (नाचा के भीष्म पितामह) और हबीब तनवीर (इन्होंने ‘नया थिएटर’ की स्थापना की और ‘चरनदास चोर’ नाटक को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई)।
  • रहस (Rahas): बिलासपुर और मैदानी क्षेत्रों में कृष्ण लीला का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण। यह कलचुरी काल से प्रभावित माना जाता है।
  • भतरा नाट: बस्तर की भतरा जनजाति द्वारा पौराणिक कथाओं पर आधारित नाट्य।

4. छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्व एवं त्योहार (Festivals)

छत्तीसगढ़ के त्योहार मुख्य रूप से कृषि और प्रकृति से जुड़े हैं। इनका हिंदी महीनों के अनुसार क्रम एग्जाम में पूछा जाता है:

  • हरेली (Hareli):
    • समय: सावन अमावस्या (यह छत्तीसगढ़ का सबसे पहला त्योहार माना जाता है)।
    • विशेषता: इस दिन किसान खेती के औज़ारों (नांगल, कुदाली) की पूजा करते हैं। बच्चे बांस की ‘गेड़ी’ बनाकर उस पर चलते हैं। इस दिन घरों के बाहर नीम की पत्तियाँ और चौखट पर कील लगाई जाती है (ताकि बुरी शक्तियाँ दूर रहें)।
  • पोला (Pola):
    • समय: भाद्रपद (भादो) अमावस्या
    • विशेषता: इस दिन बैलों (कृषि पशुओं) की पूजा की जाती है और बैलों की दौड़ होती है। बच्चे मिट्टी के बैल (जाता-पोला) और बर्तनों से खेलते हैं।
  • तीजा (Teeja):
    • समय: भाद्रपद शुक्ल तृतीया (पोला के ठीक बाद)।
    • विशेषता: सुहागिन महिलाएँ अपने मायके (ननिहाल/माता-पिता के घर) जाकर पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास रखती हैं।
  • छेरछेरा (Cherchera):
    • समय: पौष (पूस) महीने की पूर्णिमा
    • विशेषता: यह नई फसल घर आने की खुशी का त्योहार है। इस दिन बच्चे और बड़े घर-घर जाकर “छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा” बोलते हुए धान का दान मांगते हैं। यह दान और सामाजिक समरसता का पर्व है।

डायरेक्ट एग्जाम क्विक रिवीजन टेबल (Direct Score Key)

कला / विधाप्रसिद्ध कलाकारमुख्य आकर्षण / पहचान
पंडवानी (कापालिक)तीजन बाईहाथ में तंबूरा, महाभारत की कथा
भरथरी गायनसूरज बाई खांडेराजा भरथरी-रानी पिंगला का वैराग्य
पन्थी नृत्यदेवदास बंजारेसतनाम पंथ, तीव्र गति से मानव पिरामिड
नाचा (Folk Theatre)दाऊ दुलार सिंह मंदराजी / हबीब तनवीरछत्तीसगढ़ का मुख्य पारंपरिक रंगमंच
हरेली त्योहारसावन अमावस्या, गेड़ी नृत्य, औज़ारों की पूजा

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